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मित्र और वरुण :पण्डित शिवशङ्कर शर्मा काव्य तीर्थ

जैसे बहुत स्थलों में ब्रह्म और क्षत्र शब्द साथ आते हैं तद्वत् मित्र और वरुण शब्द भी पचासों मन्त्रों में साथ-साथ प्रयुक्त हुए हैं । कहीं असमस्त और कहीं समस्त । समस्त होने पर मित्रावरुण ऐसा रूप बन जाता है। मित्र और वरुण के दो-एक उदाहरण मात्र से आपको ज्ञात हो जाएगा कि यह ब्रह्मक्षत्र का वर्णन है; यथा-

मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिसादसम् ।

धियं घृताचीं साधन्ता ऋ० । १ । २।६ ॥

पूतदक्ष = पवित्र बल, जिसका बल परम पवित्र है । रिसादस रिस+अदम् । रिस – हिंसक पुरुष । अदम् = भक्षक । हिंसकों का भी भक्षक । धी – कर्म, ज्ञान । घृताचीं घृतवत्, शुद्ध घृतवत् पुष्टिकारक आदि । अथ मन्त्रार्थ – (पूतदक्षं+मित्रम्+ रिसादसम्+ वरुणञ्च + हुवे ) पवित्र बल धारी मित्र और दुष्ट हिंसकों के विनाशक वरुण को बुलाता हूँ जो दोनों (घृताचीं + धियं+साधन्ता) घृतवत् पवित्र ज्ञान को फैला रहे हैं । घृतवत् विचाररूप दूध से उत्पन्न ज्ञान घृताची है |

मित्र और वरुण के सम्बन्ध में राजा सम्राट् आदि शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं; यथा-

महान्ता मित्रावरुणा सम्राजा देवावसुरा ।

ऋतावाना वृतमा घोषतो बृहत् ॥ ४ ॥ ऋतावाना नि षेदतुः साम्राज्याय सुक्रतू ।

घृतव्रता क्षत्रिया क्षत्रमाशतुः ॥ ८ ॥

ऋ०।८।२५

(मित्रावरुणा + महान्ता) ये मित्र और वरुण महान् हैं, (सम्राजा) सम्राट् हैं, (देवौ + असुरा) देदीप्यमान और असुर – निखिल अज्ञान के निवारक हैं, (ऋतावानौ ) सत्यवान् हैं और (वृहत् + ऋतम् + आघोषतः ) महान् सत्य की ही घोषणा करते हैं ॥ ४ ॥ (ऋतावानौ + सुक्रतू ) स्वयं सत्य नियम में बद्ध और सदा शोभन कर्म में परायण मित्र और वरुण

 ( साम्राज्याय + निषेदतुः ) साम्राज्य सम्बन्धी विचार के लिए बैठते हैं । पुनः वे कैसे हैं (घृतव्रता) सत्यादि व्रतधारी पुनः (क्षत्रिया) परमबलिष्ठ और ( क्षत्रम् + आशतुः ) जो परमबल का अधिष्ठता है ॥ ८ ॥ पुनः केवल वरुण के विषय में वर्णन आता है ।।

नि षसाद घृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा । साम्राज्याय सुक्रतुः ॥ १० ॥ परिस्पशो निषेदिरे ।। – ऋ० १ । २५ /१३

(पस्त्यासु) पस्त्या प्रजा । प्रजाओं के मध्य ( साम्राज्याय) राज्य नियम स्थापित करने के लिए वह वरुण व्रतधारी हो बैठता है । इसके चारों तरफ दूतगण बैठते हैं ।।

यहाँ देखते हैं कि धर्म के नियमों को बनाने हारे व्यवस्थापकों को जिस-जिस योग्यता की आवश्यकता है उस उस का यहाँ निरूपण है । प्रथम सत्य की बड़ी आवश्यकता है, अतः मित्र और वरुण के विशेषण में जितने ऋत वा सत्यवाचक शब्द प्रयुक्त हुए हैं उतने अन्य इन्द्रादिकों के लिए नहीं । पुनः अपने व्रत में दृढ़ होना चाहिए। अतः घृतव्रत शब्द के प्रयोग भी भूयोभूयः आता है । पुनः व्यवस्थापकों को अध्यात्म बल भी अधिक चाहिए, अतः क्षत्रिय शब्द आता है । इस प्रकार ज्यों-ज्यों विचारते हैं त्यों-त्यों यही प्रतीत होता है कि मित्र और वरुण नाम ब्रह्म क्षेत्र का है। इसी ब्रह्म क्षेत्र का पुत्र वसिष्ठ है । पुनः वेदों को देख मीमांसा कीजिए, भ्रम में मत पड़िये । वसिष्ठ कोई व्याक्ति विशेष नहीं किन्तु सत्यार्थ का ही नाम वसिष्ठ है । सत्य नियम ही क्षत्रियों का भी शासक है ।

एक बात और यहाँ दिखाने के लिए परम आवश्यक है कि धर्म ही क्षत्र का भी क्षत्र है अर्थात् परम उद्दण्ड राजाओं को वश में करने हारा केवल धर्मनियम है । वह यह है-

स नैव व्यभवत्तच्छ्रेयोरूयमत्यसृजत धर्मं तदेतत् क्षत्त्रस्य क्षत्रं यद्धर्मस्तस्माद्धर्मात्परं नास्त्यथो अबलीयान् बलीयांसमाशसते धर्मेण यथा राज्ञैवं यो वै स धर्मः सत्यं वै तत्तस्मात् सत्यं वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति धर्मं वा वदन्तं सत्यं वदतीत्येतद्धैववैतदुभयं भवति ॥

– वृ० उ०११ ४ । १४ ।। आशय-वृहदारण्यकोपनिषद् में यह वर्णन आता है कि जब ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मणवर्ग, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को बना चुके तो भी देश

की वृद्धि नहीं हुई है । तब अत्यंत कल्याण स्वरूप जो धर्म है उसको सबसे बढ़िया बनाया । क्षत्र का भी शासक वही धर्म हुआ, अतः धर्म से परे कोई पदार्थ नहीं। जैसे राज्य की सहायता से वैसे ही धर्म की सहायता से एक महादुर्बल पुरुष भी परम बलिष्ठ पुरुष का साम्मुख्य करता है । वह धर्म सत्य ही है । अतः सत्य बोलने वाले को देखकर लोक कहते हैं कि यह धर्म कह रहा है। इसी प्रकार धर्म के व्याख्याता को सत्यवादी कहते हैं ।

यहाँ पर यह वर्णन आता है कि क्षत्रियों के भी शासक धर्म नियम हैं । इन नियमों में बद्ध होकर यदि कोई क्षत्रिय अन्याय करे तो प्रजाएँ उसको तत्काल रोक देती हैं। अब आप समझ सकते हैं कि वसिष्ठ के अधीन समस्त राजवंश कैसे हुए । निःसन्देह ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्गों से निर्धारित जो धर्म व्यवस्था है, उसका पालन यदि कोई न करे तो कब उसे कल्याण है, अतः सर्वराजाओं ने वसिष्ठ नामधारी धर्मनियम को ही अपना पुरोहित बनाया ||

वशिष्ठ की उत्पत्ति :पण्डित शिवशङ्कर शर्मा काव्य तीर्थ

जिस ब्रह्म और क्षत्र का विवरण ऊपर दिखलाया है उनको ही वेदों में मित्र और वरुण कहते हैं । ब्रह्म मित्र है और क्षत्र वरुण है । इसमें यद्यपि अनेक प्रमाण मिलते हैं तथापि मैं केवल शतपथ का एक प्रबल प्रमाण यहाँ लिखता हूँ । यजुर्वेद ७ । ९ की व्याख्या करते हुए शतपथ कहता है-

क्रतुदक्षौ ह वा अस्य मित्रावरुणौ । एतन्न्वध्यात्मं स यदेव मनसा कामयत इदं मे स्यादिदं कुर्वीयेति स एव ऋतुरथ यदस्मै तत्समृध्यते स दक्षो मित्र एव क्रतुर्वरुणो दक्षो ब्रह्मैव मित्रः क्षत्रं वरुणोभिगन्तैव ब्रह्म कर्त्ता क्षत्रियः ॥ १ ॥ ते ते अग्रे नानेवासतुः । ब्रह्म च क्षत्रं च । ततः शशाकैव ब्रह्म मित्र ऋते क्षत्राद्वरुणात्स्थातुम् ॥ २ ॥ न क्षत्रं वरुणः । ऋते ब्रह्मणो मित्राद्यद्ध किं च वरुणः कर्म चक्रेऽप्रसूतं ब्रह्मणा मित्रेण न है वास्मै तत्समानृधे ॥ ३ ॥ स क्षत्रं वरुणः । ब्रह्म मित्रमुपमन्त्रयां चक्र उपमा वर्तस्व सं सृजावहै पुरस्त्वा करवै त्वत्प्रसूतः कर्म करवा इति

तथेति तौ समसृजेतां तत एष मैत्रावरुणे ग्रहोऽभवत् ॥ ४ ॥ सो एव पुरोधा । तस्मान्न ब्राह्मणः सर्वस्येव क्षत्रियस्य पुरोधां कामयते । सं ह्येतौ सृजेते सुकृतं च दुष्कृतं च नो एव क्षत्रियः सर्वमिव ब्राह्मणं पुरोदधीत सं ह्ये ल्वेतौ सृजेते सुकृतं च दुष्कृतं च स यत्ततो वरुणः कर्म चक्रे प्रसूतं ब्रह्मण मित्रेण सं है वास्मै तदानृधे । शतपथ । ४ । १ ॥

क्रतु और दक्ष ही इसके मित्र और वरुण हैं । यह अध्यात्म विषय है । सो यह यजमान मन से जो यह कामना करता है कि यह मुझे हो और यह कर्म मैं करूँ, इसी का नाम क्रतु है और जो इस कर्म से उसको समृद्धि प्राप्त होती है, वही दक्ष है । मित्र ही क्रतु है और वरुण ही दक्ष है । ब्रह्म अर्थात् ज्ञानी न्यायी वर्ग ही मित्र है और क्षत्र अर्थात् न्यायी शासक वर्ग ही वरुण है । मन्ता ही ब्रह्म है और कर्त्ता ही क्षत्रिय है ॥ १ ॥ पहले ब्रह्म और क्षत्र ये दोनों पृथक्-पृथक् रहते थे । ब्रह्म जो मित्र है वह तो क्षत्र वरुण के बिना पृथक् रह सका, किन्तु क्षत्र जो वरुण है वह ब्रह्म मित्र के बिना न रह सका ॥ २ ॥ क्योंकि ब्रह्म मित्र की आज्ञा बिना क्षत्र वरुण जो-जो कर्म किया करता था वह वह उसके लिए वृद्धिप्रद नहीं होता था ॥ ३ ॥ सो इस क्षत्र वरुण ने ब्रह्म मित्र को बुलाया और कहा कि मेरे समीप आप रहें। (संसृजाव है ) हम दोनों मिल जाएं। मिलकर सर्व व्यवहार करें। मैं आपको आगे करूँगा और आपकी आज्ञानुसार मैं कर्म करूँगा । ब्राह्मण इसको स्वीकार कर दोनों मिल गये ॥ ४ ॥ तब से ही मैत्रा वरुण नाम का एक ग्रह अर्थात् एक पात्र होता है ॥ ४ ॥ इस प्रकार पौरोहित्य चला। इस कारण सब ब्राह्मण, सब क्षत्रिय की पौरोहित्य – वृत्ति की कामना नहीं करता, क्योंकि ये दोनों मिलकर सुकृत और दुष्कृत कर्म करते हैं अर्थात् दोनों ही पाप-पुण्य के भागी होते हैं । वैसा ही सब क्षत्रिय सब ब्राह्मण को पुरोहित नहीं बनाता, क्योंकि दोनों मिलकर सुकृत और दुष्कृत करते हैं । तब से क्षत्रिय वरुण जो-जो कर्म ब्राह्मण मित्र से आज्ञा पाकर किया करता था वह वह कर्म उसको वृद्धिप्रद हुआ । इस प्रमाण से सिद्ध होता है कि ब्रह्म को मित्र तथा क्षत्र को वरुण कहते हैं और इन दोनों को मिलकर ही व्यवस्था करनी चाहिए। इसमें यदि शासक वर्ग, ज्ञानी वर्ग की अधीनता को स्वीकार नहीं करे तो उसका निर्वाह कदापि न हो । अब आप वशिष्ठ और अगस्त्य दोनों मैत्रावरुण क्यों कहलाते

स प्रकेत उभयस्य विद्वान् सहस्रदान उत वा सदानः । यमेन ततं परिधिं वयिष्यन्नप्सरसः परि जज्ञे वसिष्ठः ॥

– ऋ० ७ । ३३ । १२

वेदों में एक यह भी रीति है कि गुण में भी चेतनत्व का आरोप कर गुणिवत् वर्णन करने लगते हैं। राज्य नियम से लोक ज्ञानी विद्वान् महाधनाढ्य होते हैं अतएव वह नियम ही ज्ञानी, विद्वान्, महाधनाढ्य आदि कहा जाता है। (स: + प्रकेतः ) वह परम ज्ञानी (उभयस्य+ विद्वान्) ऐहलौकिक और पारलौकिक दोनों सुखों को जानता हुआ वसिष्ठ (सहस्रदान: ) बहुत दानी होता है । (उत वा + सदान: ) अथवा सर्वदा दान देता ही रहता है। कब ? सो आगे कहते हैं— (यमेन ) ब्रह्म क्षत्रों के प्रबल दण्डधारा से ( ततम् + परिधिम् ) विस्तृत व्यापक परिधि रूप वस्त्र को (वयिष्यन्) बुनता हुआ (वसिष्ठः ) वह सत्य धर्म ( अप्सरसः + परि जज्ञे ) सर्व संस्थाओं को लक्ष्य करके उत्पन्न होता है। अब आगे सार्वजनीन परम हितकारी सिद्धान्त कहते हैं-

सत्रे ह जाता विषिता नमोभिः कुम्भेरेतः सिषिचतुः समानम् । ततोह मान उदियाय मध्यात्ततो जातमृषिमाहुर्वसिष्ठम् ॥ १३ ॥ उक्थभृतं सामभृतं विभर्ति ग्रावाणं बिभ्रत्प्रवदात्यग्रे उपैनमाध्वं सुमनस्यमाना आ वो गच्छाति प्रतृदो वसिष्ठः ॥

ऋ० ।७।३३ । १४ ॥ सत्र – सतांत्र: सत्रः । सज्जनों की जो रक्षा करे, उस यज्ञ का नाम सत्र है । अथवा जो सत्य यज्ञ है, वही सत्र है । सम्पूर्ण प्रजाओं के हितसाधक उपायों के बनाने के लिए जो अनुष्ठान है, वही महासत्र है । कुम्भ = वासतीवर कलश अर्थात् सुन्दर उत्तम उत्तम जो बसने के ग्राम- नगर हैं वे ही यहाँ कुम्भ हैं। जैसे कुम्भ में जल स्थिर रहता है तद्वत् ग्राम में बसने पर मनुष्य स्थिर हो जाता है । अतः सर्व भाष्यकार, इस कुम्भ का नाम वासतीवर रखा है । मानमाननीय । जिसका सम्मान सब कोई करे । मापनेहारा, परीक्षक इत्यादि । अथ मन्त्रार्थ-

(सत्रे + ह + जातौ ) यह प्रसिद्ध बात है कि जब बहुत सम्मति से सत्र में दीक्षित होते हैं और ( नमोभिः + इषिता) सत्कार से जब अभिलाषित होते हैं अर्थात् जब ब्रह्मसमूह और क्षत्रसमूह को बड़े सत्कार के साथ

सर्व हितसाधक धर्मप्रणेतृ सभारूप महायज्ञ में प्रजाएँ बुलाकर धर्म नियम बनवाती हैं तब ( समानम्+ रेतः + कुम्भे+सिषिचतुः ) वे मित्र और यरुण अर्थात् ब्रह्म और क्षत्र दोनों मिलकर समान रूप से रेत – रमणीय धर्मरूप प्रवाह को प्रत्येक ग्राम रूप कलश में सींचते हैं। (ततः+ह+ मान: + उदियाय) तब सबका मापनेहारा, सर्व को एक दृष्टि से देखनेहारा एक मानने योग्य नियम उत्पन्न होता है । ( ततः + मध्यात्+ वसिष्ठम् + ऋषिम् + जातम् + आहुः ) और उसी के मध्य से वसिष्ठ ऋषि को उत्पन्न कहते है ॥ १३ ॥ इसका आशय विस्पष्ट है अब आगे उपदेश देते हैं कि प्रजामात्र को उचित है इस वसिष्ठ का सत्कार करे । ( प्रतृदः ) हे अत्यन्त हिंसक पुरुषो! हे प्रजाओं में उपद्रवकारी नरो ! (वः + वसिष्ठः + आगच्छति) तुम्हारे निकट राष्ट्र नियम आता है। (सुमनस्यमानाः ) प्रसन्न मन होकर तुम (एनम् ) इस धर्म नियम को ( उप+आध्वम्) अपने में देववत् आदर करो। वह वसिष्ठ कैसा है (उक्थभृतम् + सामभृतम्) उक्थभृत्=ऋग्वेदीय होता । सामभृत = उद्भाता । (विभर्ति ) इन दोनों को धारण किये हुए हैं और (ग्रावाणम्+ बिभ्रत्) उग्र प्रस्तर अर्थात् दण्ड को लिए हुए है। यजुर्वेदी अध्वर्यु को भी साथ में रखे हुए है (अग्रे + प्रवदति) और वह आगे-आगे निज प्रभाव को कह रहा है । १४ ॥ जैसा धर्म शास्त्रों में लिखा है कि ” व्यवराचापि वृत्तस्था” न्यून से न्यून ॠग्वेदी, यजुर्वेदी और सामवेदी तीन मिलकर जिस धर्म को नियत करें उसको कोई भी विचलित न करने पावे । इसी ऋचा से यह नियम बना है । प्रतृद – उतृदिर् हिंसानादरयोः । हिंसा और अनादर अर्थ में तृद् धातु आता है, अर्थात् जो राष्ट्रीय नियमों को हिंसित और अनादर करते हैं, वही यहाँ प्रतृद हैं। अब और भी अर्थ विस्पष्ट हो जाता है । धर्म नियम किसके लिए बनाए जाते हैं । निःसन्देह उन दुष्ट पुरुषों को नियम में लाने के लिए ही धर्म की स्थापना होती है, अतः वेद भगवान् यहाँ कहते हैं कि हे दुष्ट हिंसको और निरादरकारी जीवो! देखो तुम्हारे निकट धर्म आ रहे हैं । इनका प्रतिपालन करो । यह नियम तीनों वेदों की आज्ञानुसार स्थापित हुआ है, यदि इसका निरादर तुमने किया तो तुम्हारे ऊपर महादण्ड पतित होगा। इससे यह भी विस्पष्ट होता है कि वसिष्ठ नाम धर्म नियम का ही है, जो ब्रह्मक्षत्र सभा से सर्वदा सिक्त होता रहता है ।

त इन्निण्यं हृदयस्य प्रकेतैः सहस्रवल्शमभि सं चरन्ति । यमेन ततं परिधिं वयन्तोऽप्सरस उपसेदुर्वसिष्ठा ॥

७।३३।९

वसिष्ठाः = यहाँ वसिष्ठ शब्द बहुवचन है। इस मण्डल में बहुवचनान्त वसिष्ठ शब्द कई एक स्थान में प्रयुक्त हुआ है । (ते वसिष्ठाः ) वे – वे धर्म नियम ( इत्) ही (निण्यम्) अज्ञानों से तिरोहित = ढँके हुए (सहस्रवल्शम्) सहस्र शाखायुक्त उस-उस स्थान में (हृदयस्य+प्रकेतैः ) हृदय के ज्ञान-विज्ञानरूप महाप्रकाश के साथ ( संचरन्ति ) विचरण कर रहे हैं । (यमेन + ततम् + परिधिम् ) दण्ड की सहायता से व्यापक परिधि रूप वस्त्र को ( वयन्तः ) बुनते हुए ( अप्सरसः +उपसेदुः ) उस- उस संस्था के निकट पहुँचते हैं ।।

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अब मैंने यहाँ कई ऋचाएँ उधृत की हैं। विद्वद्गण विचार करें कि वसिष्ठ शब्द के सत्यार्थ क्या हैं ? इन्हीं ऋचाओं को लेकर सर्वानुक्रमणी वृहद्देवता और निरुक्त आदि में जो-जो आख्यायिकाएँ प्रचलित हुई हैं, उनसे भी यही अर्थ निःसृत होते हैं। तद्यथा वृहद्देवता–

उतासि मैत्रावरुणः । ऋ० । ७ । ३३ । ११

ऋचा की सायण व्याख्या में वृहद्देवता की आख्यायिका उद्धृत है, वह यह है-

तयोरादित्ययोः सत्रे दृष्ट्वाप्सरस मुर्वशीम् । रेतश्चस्कन्द तत्कुम्भे न्यपतद्वासतीवरे । तेनैव तु मुहूर्त्तेन वीर्य्यवन्तो तपस्विनौ । अगस्त्यश्च वसिष्ठश्च तत्रर्षी संबभूवतुः । बहुधा पतितं रेतः कलशेच जले स्थले । स्थले वसिष्ठस्तु मुनिः संभूत ऋषिसत्तमः । कुम्भे त्वगस्त्यः संभूतो जले मत्स्यो महाद्युतिः । उदियाय ततोऽगस्त्यः शम्यामात्रो महातपः । मानेन संमितोयस्मात् तस्मात् मान इहो च्यते । इत्यादि ॥

अदिति के पुत्र मित्र और वरुण हुए। वे दोनों किसी यज्ञ में गये । वहाँ उर्वशी को देख साथ ही दोनों का रेत गिर गया । वह रेत कुछ घड़े में और कुछ स्थल में जा गिरा। स्थल में जो गिरा उससे वसिष्ठ और कलश में जो गिरा उससे अगस्त्य उत्पन्न हुए । अतएव इन दोनों को मैत्रावरुण कहते हैं, क्योंकि ये दोनों मित्र और वरुण के पुत्र हैं । अगस्त्य जिस कारण घट से उत्पन्न हुए, अतः इनके घटयोनि, कलशज आदि भी नाम हैं ।

वसिष्ठ और अगस्त :पण्डित शिवशङ्कर शर्मा काव्य तीर्थ

देश में अनेक त्रुटियाँ हैं, गवेषणा नहीं कही जाती । शतपथादि ब्राह्मण ग्रन्थों में तथा महाभारत, रामायण, पुराणों में बहुत सी ऐसी आख्यायिकाएँ उक्त हैं जिनसे बड़े-बड़े मानव हितकारी सिद्धांत निकलते हैं, क्योंकि वेदों से वे सब आए हुए हैं, किन्तु कथा के स्वरूप में वे वैदिक सिद्धान्त लिखे गये हैं, अतः उनका आशय आज सर्वथा अस्त-व्यस्त हो गया है । उदाहरण के लिये, मैं वेदों के सुप्रसिद्ध वसिष्ठ और अगस्त दो ऋषियों को प्रस्तुत करता हूँ। क्या यह सम्भव है कि दो पुरुषों के बीज मिलकर बालकों को उत्पन्न करें, वह भी साक्षात मातृगर्भ में नहीं किन्तु स्थल और घट में उत्पत्ति हो ? उर्वशी के दर्शन मात्र से मित्र और वरुण दो देवों का चित्त चञ्चल हो जाए ? उनसे तत्काल ही एक या दो सुभग बालक उत्पन्न हों और तत्काल ही देवगण उन्हें कमल के पत्रों पर बिठला उनकी स्तुति पूजा करें ? उनमें से एक बालक सम्पूर्ण सूर्यवंशी राजाओं का पुरोहित बन सृष्टि की आदि से प्रलय तक अजर-अमर हो एक रूप में सदा स्थिर रहे ? क्या यह सम्भव है कि वसिष्ठ की एक गौ जो चाहे सो करे ? हजारों प्रकार की सेनाओं को वह स्वयं रच ले, पृथिवी के समस्त पदार्थ उसकी आज्ञा में हाथ जोड़कर खड़े रहें, इस शबला गौ के लिए वसिष्ठ और विश्वामित्र में तुमुल संग्राम हो ? वसिष्ठ के शतपुत्रों को विश्वामित्र मरवा दे, इस शोक में वसिष्ठ सुमेरु पर्वत के सबसे ऊपर के शिखर पर से गिरें तो भी न मरें । अग्नि उन्हें न जलावे, समुद्र इनसे डर जाए । हाथ, पैर और सब अंगों को बाँध नदियों में डूबने को जाएँ, किन्तु

नदियाँ भाग जाएँ इनके बँधन को तोड़ डालें इत्यादि शतशः कथाएँ वशिष्ठ के विषय में जो कही जाती हैं उनका क्या आशय है ? क्या सचमुच ये वसिष्ठ और अगस्त्य दो महान् ऋषि वेश्या पुत्र हैं । उर्वशी कोई वेश्या है ? क्या मित्र और वरुण कोई ऐसे तुच्छ देव हैं, जो झट स्त्री पर मोहित हो जाते ? इत्यादि । क्या इनकी सत्यता के अन्वेषण के लिए कभी हम प्रयत्न करते हैं ? निःसन्देह यह अद्भुत कथा है । इससे अति गूढ़ बातें निकलती हैं। मित्र और वरुण के पुत्र वसिष्ठ एवं अगस्त्य की आख्यायिका से राज्य व्यवस्था सम्बन्धी एक परम उपयोगी वैदिक सिद्धान्त विनिःसृत होता है, अतः मैं इस भाग में इसको प्रथम दर्शा पश्चात् वसिष्ठ सम्बन्धी अन्यान्य कथाओं का आशय प्रकट करूँगा । इसको ध्यान से आप लोग पढ़ें ।

इसके लिए प्रथम यह जानना आवश्यक है कि स्वतन्त्र और अज्ञानी राजा से देश की कितनी हानि हुई है और हो रही है । अतएव पृथिवी पर के सभ्य देशों में आजकल दो प्रकार के राज्य हैं। एक प्रजाधीन, दूसरा सभाधीन अर्थात् जिसमें राजा को सभा की आज्ञा का वशवर्ती होना पड़ता है । सर्व विद्वानों की प्रायः इसमें एक सम्मति है कि प्रजाधीन ही राज्य चाहिए और यही मनुष्यता है। ज्यों-ज्यों मनुष्यता की वृद्धि होगी त्यों-त्यों स्वयं राज्य व्यवस्था शिथिल होती जाएगी, क्योंकि प्रत्येक मानव निज कर्तव्य को अच्छी प्रकार निबाहेगा । इतिहास से विदित होता है कि जब-जब राजा उच्छृंखल हुआ है तब-तब महती आपत्ति प्रजाओं में आई हैं । अतः वेद में ऐसा वर्णन आता है

यत्र ब्रह्म च क्षत्रञ्च सम्यञ्चौ चरतः सह ।

तं लोकं पुण्यं प्रज्ञेषं यत्र देवाः सहाग्निना ॥

– यजु० २० । २५

ब्रह्म = ज्ञान, विज्ञान, परमज्ञानी जन, धर्मतत्वज्ञ, धर्माध्यक्ष पुरुषों की महती सभा इत्यादि । क्षत्रबल, प्रजाशासक वर्ग, धार्मिक बली, प्रजा शासकों की महती सभा इत्यादि । प्रज्ञेषम् = प्रजानामि जानता हूँ । देव – प्रजावर्ग, शास्य प्रजाएँ । अग्नि-परमात्मा, ब्राह्मण, अग्निहोत्रादि कर्म यद्यपि वैदिक शब्द लोक में भी प्रयुक्त हुए हैं, परन्तु लोक में उन वैदिक शब्दों के अर्थ में बहुत कुछ परिवर्तन हो गया है। वेदों के अर्थों के विचार से वे वे अर्थ अच्छी प्रकार भासित होने लगते हैं । अथ मन्त्रार्थ – (तम्+लोकम्+ पुण्यम्+प्रज्ञेषम् ) उस लोक को मैं पुण्य समझता हूँ । (यत्र+ब्रह्म+च+क्षत्रन्+च ) जहाँ ज्ञान और बल अथवा ज्ञानी और बली अथवा धर्मव्यवस्थापक विद्वद्वर्ग और उस व्यवस्था के अनुसार शासन करने वाले राजगण (सम्यञ्चौ) अच्छी प्रकार मिलकर परस्पर सत्कार करते हुए (सह + चरतः ) साथ विचरण करते हैं, साथ ही सर्व व्यवहार करते हैं । (यत्र+देवा:) और जहाँ प्रजावर्ग (अग्निना + सह) ईश्वर, ज्ञानी और अग्निहोत्रादि शुभ कर्म के साथ विचरण करते हैं अर्थात् जहाँ सर्व प्रजाएँ आस्तिक हो शुभ कर्मों को यथा विधि करते हैं और ज्ञानियों के पक्ष में रहते हैं । वही देश-वही लोक पवित्र है ।

इदं मे ब्रह्म च क्षत्रं चोभे श्रियमश्नुताम् ।

मयि देवा दधतु श्रियमुत्तमां तस्यैते स्वाहा ॥

यजु० ३२ । १६

यह भी एक प्रार्थना है । (इदम+च+क्षत्रम्+च ) यह ज्ञानी और शासक वर्ग (उभे+मे+श्रियन् + अश्नुताम् ) दोनों ही मिलकर मेरी सम्पत्ति को भोग में लावें। (मयि+देवाः +उत्तमाम्+ श्रियम् + दधतु) मुझमें समस्त शुभाभिलाषी प्रजावर्ग उत्तम श्री सम्पत्ति स्थापित करे । (तस्यै+ते+स्वाहा ) हे सम्पत्ति ! तुम्हारे लिये मेरा सर्वस्व त्याग है । स्वाहा = स्व + आहा । स्व- धन । आहा सब प्रकार से त्याग । अपने स्वत्त्व को सर्व प्रकार से त्याग करने का नाम स्वाहा है। उन पूर्वोक्त दो मन्त्रों में ही नहीं किन्तु यजुर्वेद के बहुत स्थलों में ब्रह्म और क्षत्र दोनों को मिलकर व्यवहार करने का वर्णन आता है। दो-चार उदाहरण ये हैं-

स न इदं ब्रह्म क्षत्रं पातु । – यजु० १८ । ३८

वह ब्रह्म और क्षत्र हमको पाले । यही वाक्य इस अध्याय की ३९, ४०, ४१, ४२, ४३ वीं कण्डिकाओं में आया है ।

सोमः पवतेऽस्मै ब्रह्मणेऽस्मै क्षत्राय ॥ ७ ॥ २१ ॥ परमात्मा इस ब्रह्म और क्षत्र को पवित्र करता है | ब्रह्मणे पिन्वस्व क्षत्राय पिन्वस्व । ३८ | १४ ॥

हे भगवान! ब्रह्म और क्षत्र को उन्नत करो । पुनः प्रार्थना आती है, देवा ऋ० प्रजापति दे० भूरिगार्गी पंक्ति पंचम कि-

स नो भुवनस्य पते प्रजापते यस्य त उपरि गृहा यस्य वेह | अस्मै ब्रह्मणेऽस्मै क्षत्राय महि शर्म यच्छ स्वाहा ।

– यजु० १८ । ४४ ( भुवनस्य+पते+प्रजापते) हे सम्पूर्ण विश्वाधिपति प्रजापति परमात्मन्! (यस्य ते उपरि + गृहाः ) जिस आपके गृह ऊपर हैं । (यस्य+ वा + इह ) जिस आपके गृह इस लोक में हैं अर्थात् जो आप सर्वव्यापक हैं। (सः+नः+अस्मै+ब्रह्मणे+अस्मै + क्षत्राय) सो आप मेरे इस परम ज्ञानी वर्ग को और शासक वर्ग को (महि+ शर्म + यच्छ) बहुत कल्याण देवें । (स्वाहा) हे परमात्मन् ! आपके लिए मेरा सर्व त्याग है |

अब अनेक उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं । वेदों को विचारिये मालूम होगा कि जब ज्ञान और बल दोनों मिलकर कार्य करते हैं तब ही परम कल्याण होता है । अतएव मनु जी बहुत जोर देकर कहते हैं कि- दशावरा वा परिषद् यं धर्मं परिकल्पयेत् । त्र्यव्यवरा वापि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत्” । न्यून से न्यून दश विद्वानों की अथवा बहुत न्यून हो तो तीन विद्वानों की सभा जैसी व्यवस्था करे, उसका उल्लंघन कोई भी न करे |

सूर्य-चन्द्र की उत्पत्ति :पण्डित शिवशङ्कर शर्मा काव्य तीर्थ

मैं अभी कह चुका हूँ कि परमात्मा ने ही इस सूर्य-चन्द्र को बनाया है । परंतु पुराण कुछ और ही कहते हैं । वे इस प्रकार वर्णन करते हैं कि कश्यप ऋषि की अदिति, दिति, दनु, कद्रू, बनिता आदि अनेक स्त्रियाँ थीं । इसी अदिति से आदित्य अर्थात् सूर्य, चन्द्र, तारा, नक्षत्र आदि उत्पन्न हुए ।

भागवतादि यह भी कहते हैं कि अत्रि ऋषि के नेत्र से चन्द्र उत्पन्न हुआ है; यथा-

अथातः श्रूयतां राजन् वंशः सोमस्य पावनः । यस्मिन्नैलादयो भूपाः कीर्त्यन्ते पुण्यकीर्त्तयः ॥ सहस्रशिरसः पुंसो नाभिह्रदसरोरुहात् । जातस्यासीत्सुतो धातुरत्रिः पितृसमो गुणैः ॥

तस्य दृग्भ्योऽभवत्पुत्रः सोमोऽमृतमयः किल ।

विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पतिः ॥

कोई कहता है कि समुद्र से चन्द्र की उत्पत्ति हुई । इसी प्रकार मेघ कैसे बनता, वायु क्यों कभी तीक्ष्ण और कभी मन्द होती, पृथिवी से किस प्रकार गरम जल और अग्नि निकलता, ज्वालामुखी क्या वस्तु है, भूकम्प क्यों होता, विद्युत् क्या वस्तु है, मेघ में भयंकर गर्जना क्यों होती, इत्यादि विषय विज्ञान शास्त्र के द्वारा प्रत्येक पुरुष को जानने चाहिएँ” नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।” मनुष्य की उत्पत्ति ही इसी कारण हुई है । जिज्ञासा करना मनुष्य का परम धर्म है । वेदों और शास्त्रों में इसकी बहुधा चर्चा आई है। हम अपने चारों तरफ सहस्रों पदार्थ देखते हैं । उनको विचार दृष्टि से अवश्य जानना चाहिए । आकाशस्थ ताराएँ कितनी बड़ी और कितनी छोटी हैं, वे पंक्तिबद्ध और बन के समान क्यों दीखतीं, पृथिवी से ये कितनी दूरी पर हैं ! एवं नक्षत्रों की अपेक्षा चन्द्र क्यों बड़ा दीखता पुनः इसके इतने रूप कैसे बदलते ! प्रायः सब ही ग्रह पूर्व से पश्चिम की ओर आते हुए क्यों दीख पड़ते। इसी प्रकार पृथिवी पर नाना घटनाएँ होती रहती हैं- कभी वर्षा ऋतु में मेघ भयङ्कर रूप से गर्जता, बिजली लगकर कभी- कभी मकान और बड़े-बड़े ऊँचे वृक्ष जल जाते, मनुष्य मर जाते, बिजली कहाँ से और कैसे उत्पन्न होती, मेघ किस प्रकार बनता, इतने जल आकाश में कहाँ से इकट्ठे हो जाते, पुनः मेघ आकाश में किस आधार पर बड़े वेग से दौड़ते, वहाँ ओले कैसे बनते, फिर थोड़ी ही देर में मेघ का कहीं पता नहीं रहता, इत्यादि बातें अवश्य जाननी चाहिएँ ।

ऐ मनुष्यो ! ये ईश्वरीय विभूतियाँ हैं, इन्हें जो नहीं जानता वह कदापि ईश्वर को नहीं जान सकता। वह अज्ञानी पशु है । स्वयं वेद भगवान् मनुष्य जाति को जिज्ञासा की ओर ले जाते हैं, आगे इसी विषय को देखिये । अतः जिज्ञासा करना मनुष्य का परम धर्म है ।

ऐ मनुष्यो ! इस जगत् में यद्यपि परमात्मा साक्षात् दृष्टिगोचर नहीं होता तथापि इसकी विभूतियाँ ही दीख पड़तीं और इन्हीं में वह छिपा हुआ है । अतएव बड़े-बड़े प्राचीन ऋषि कह गये हैं कि “आराममस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चन ” । इस परमात्मा की वाटिका को ही सब कोई देखते हैं और इसी के द्वारा उसको देखते हैं, साक्षात् उसको कोई नहीं देखता । अतः इस जगत् के वास्तविक तत्वों को जो सदा अध्ययन किया करता है वह, मानो, परम्परा से ईश्वर का ही चिन्तन कर रहा है । व्यास ऋषि इसी कारण ब्रह्म का लक्षण बताते हुए कहते हैं कि ‘जन्माद्यस्य यतः ” जिससे इस जगत् का जन्म, स्थिति और संहार हुआ करता है, वही ब्रह्म है । इससे ब्रह्म और जगत् का सम्बन्ध बतलाया, अतः यदि जगत को जान लेवे तो, मानों, ईश्वर की रचना जान ली, यह कितनी बड़ी बात है । अत: जिज्ञासुओ ! प्रथम ईश्वर की रचना की ओर ध्यान दो ।

पृथिवी आदि की उत्पत्ति :पण्डित शिवशङ्कर शर्मा काव्य तीर्थ

वेदों में पृथिवी आदि की उत्पत्ति यथार्थ रूप से लिखी हुई है। धीरे-धीरे बहुत दिनों में यह पृथिवी इस रूप में आई है। यह प्रथम सूर्यवत् जल रही थी, अभी तक पृथिवी के भीतर अग्नि पाया जाता है । कई स्थानों में पृथिवी से अग्नि की ज्वाला निरंतर निकल रही है। इसी को ज्वालामुखी पर्वत कहते हैं। कहीं-कहीं गरम पानी निकलता है। इसका भी यही कारण है कि वहाँ पर अग्नि है। धीर-धीरे ऊपर से पृथिवी शीतल होती गई । तब जीव-जन्तु उत्पन्न हुए । लाखों वर्षों में, वह अग्नि की दशा से इस दशा में आई है। वेद विस्पष्ट रूप से कहते हैं कि ” सूर्यचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवंच पृथिवीञ्चांत- रिक्षमथो स्वः।” परमात्मा पूर्ववत् ही सूर्य, चन्द्र, द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष और सब प्रकार सुखमय पदार्थ बनाया करता है ।

पुराण और पृथिवी की उत्पत्ति

परंतु शोक की बात है कि पुराण इस विज्ञान को भी नहीं मानते और एक असंभव गाथा बनाकर लोगों को महाभ्रम एवं अज्ञानरूप महासमुद्र में डुबो देते हैं। देवी भागवत् पद्म पुराण आदि अनेक पुराणों में यह कथा आती है कि – प्रथम विष्णु ने जल उत्पन्न किया और उसी में घर बना कर सो गये। इनके नाभि कमल से जल के ऊपर एक ब्रह्मा उत्पन्न हुआ । वह कमल पर बैठकर सोच ही रहा था कि मैं कहाँ से आया, मेरा क्या कार्य है इत्यादि । उतने में ही दो दैत्य मधु एवं कैटभ विष्णु के कर्णमल से उत्पन्न हो ( विष्णुकर्णमलोद्भूतौ ) जल के ऊपर आ के ब्रह्मा को कमल के ऊपर बैठा देख बोले कि अरे तू ! इस पर से उतर जा, हम दोनों बैठेंगे। इस प्रकार तीनों लड़ने लगे । पश्चात् ब्रह्मा की पुकार से साक्षात् विष्णु जी आये और इन दोनों असुरों को छल से मारा। तब से ही विष्णु जी मधुसूदन कहलाने लगे । इन दोनों के शरीर से जो रक्त, मज्जा, मांस निकला वही जल के ऊपर जमकर पृथिवी बन गई। इसी कारण इसका नाम मेदिनी पड़ा है, क्योंकि इन मधुकैटभों के मेद अर्थात् मज्जा से बनी हुई है ।

प्रमाण – ” मधुकैटभयोरासीन्मेदसैव परिप्लुता । तेनेयं मेदिनी देवी प्रोच्यते ब्रह्मवादिभिः ॥” इत्यादि प्रमाण देवी भागवत आदि में देखिये । अथवा शब्दकल्पद्रुम आदि कोशों में मेदिनी शब्द के ऊपर इन्हीं प्रमाणों को देखिये। जल की ही प्रथम सृष्टि हुई, यह पुराणों का कथन बहुत ही मिथ्या है। जब जलराशि समुद्र बन गया, जिसमें विष्णु भगवान् सोए हुए थे तो समुद्र किस आधार पर था । अज्ञानी पुरुष समझते हैं कि नौका के समान यह पृथिवी जल के ऊपर ठहरी हुई है वा शेषनाग के शिर पर कच्छप की पीठ पर यह स्थापित है । यदि मधुकैटभ के रुधिर- मांस-मज्जा से यह पृथिवी बनी तो मधुकैटभ का शरीर कहाँ से और किस पदार्थ से बना हुआ था । विष्णु यदि शरीरधारी थे तो उनका शरीर किन धातुओं से बना हुआ था । पुनः कान के मैल कहाँ से आए। कमल कैसे और किन पदार्थों से बने इत्यादि बातों पर विचार करने से प्रतीत होता है कि पुराणों के लेखक भ्रमयुक्त थे ।

ईश्वर का अस्तित्व :पण्डित शिवशङ्कर शर्मा काव्य तीर्थ

प्रथम यहाँ शंका हो सकती है कि ईश्वर ही कोई वस्तु सिद्ध नहीं होता । इसके उत्तर में बड़े-बड़े शास्त्र हैं, यहाँ केवल दो-एक बात पर ध्यान दीजिये । भाव से भाव होता है अर्थात् प्रथम किसी पदार्थ का होना आवश्यक है । उस पदार्थ से अन्य पदार्थ होगा । वह पदार्थ चेतन परम ज्ञानी परमविवेकी होवे, क्योंकि परम ज्ञानी ही इस ज्ञानमय जगत् को बना सकता है । अतः कोई परम ज्ञानी पुरुष सदा से विद्यमान है, वही परमात्मा ब्रह्म आदि नाम से पुकारा जाता है । ईश्वर के अस्तित्व में दूसरा प्रमाण रचना है। अपने शास्त्र में ” जन्माद्यस्य यतः ” जिससे इस जगत् का जन्म – पालन और विनाश हो, उसे ईश्वर कहा है । इसकी रचना देखकर प्रतीत होता है कि कोई ज्ञानी रचयिता है। किसी वन में सुन्दर भवन, उसके चारों तरफ पुष्पवाटिका, कूप, तड़ाग और उसमें भोजन के अनेक पदार्थ इत्यादि मनुष्य योग्य वस्तु देखी जाएँ किन्तु किसी कारणवश कोई अन्य पुरुष वहाँ न दीख पड़े तो भी द्रष्टा पुरुष यही अनुमान करेगा कि इस भवन का रचयिता कोई ज्ञानी पुरुष है । ऐसा नहीं हो सकता कि स्वयं ये अज्ञानी प्रस्तर, मिट्टी और पानी इकठ्ठे हो ऐसा सुन्दर मकान बन गये हों । यदि ऐसा हो तो प्रतिदिन लाखों भवन बन जाने चाहिए और वाल्मीकि रामायण एवं महाभारत के जितने अक्षर हैं उतने अक्षर काटकर किसी बड़े बर्तन में रख दिए जाएँ । यदि वे अक्षर मिलकर श्लोकों के रूप में बन जाएँ तो कहा जा सकता है कि ये विद्यमान परमाणु स्वयं जगत् के रूप में बन गये किन्तु ऐसा हो नहीं सकता । अतः सिद्ध है कि कोई रचयिता चेतन है, वही ईश्वर है । वह ईश्वर स्वयं अपने शरीर से इस जगत् को नहीं बनाता । यदि ऐसा करे तो वह भिखारी समझा जाए और तब ईश्वर के शरीर के समान यह जगत् भी पवित्र होना चाहिए। दूसरी बात यह है कि ईश्वर का कोई शरीर नहीं, वह अशरीर है। जो शरीरधारी हो, वह सर्वव्यापक नहीं हो सकता, लेकिन ईश्वर सर्वव्यापक है । अतः सिद्ध है कि कोई अचेतन जड़ पदार्थ भी सदा से चला आता है, इसी को प्रकृति कहते हैं । वेदों में इसका नाम अदिति है । अब वह जगत् जड़ चेतन मिश्रित है, अतः जड़ भिन्न कोई चेतन भी सदा से विद्यमान था, ऐसा अनुमान होता है । उसी का नाम जीव है । इसी प्रकृति और जीव की सहायता से परमात्मा सृष्टि रचा करता है । सृष्टि विज्ञान पर आगे लेख रहेगा । यहाँ इतना और भी जानना चाहिए कि परमात्मा सदा एक  स्वरूप रहते हैं, इनमें किसी प्रकार का परिणाम नहीं । जैसे दूध से दही बनता है, जल से भाप – बर्फ और वर्षा से बनौरे बनते हैं, इसी का नाम परिणाम है । जीव भी निज स्वरूप से अपरिणामी है केवल प्रकृति ही परिणामिनी है । कैसे आश्चर्य प्रकृति का परिणाम है। वही कहीं सूर्यरूप महाग्नि का समुद्र बनी हुई है। कहीं जलमय हो रही है । कहीं सुन्दर मानव शरीर की छवि दिखा रही है । कहीं कुसुमरूप में परिणत हो कैसे अपूर्व सुरभि फैला रही है । कहीं मृग शरीर बन के दौड़ रही है और कहीं सिंह शरीर से मृग को खा रही है । अहा !! कैसी अद्भुत लीला उस प्रकृति द्वारा ईश्वर दिखा रहा है। आप विचार तो करें यदि कोई महान् चेतन प्रबन्धकर्त्ता न होता तो जड़ अज्ञानिनी अमन्त्री प्रकृति ऐसी नियम बद्ध लीला कैसे दिखला सकती। वह जड़ प्रकृति कैसे विचारती कि कुछ परमाणु मिल के सुगन्धि बने । कुछ पत्ते, कुछ डाल, कुछ बीज बने । यह विचार परमाणु पुंजों में कैसे उत्पन्न हो सकता है । अतः सिद्ध है कि प्रबन्धकर्त्ता कोई महान् चेतन है । यह तो आप देखें कूष्माण्ड (पेठा) का एक बीज किसी अच्छे खेत में लगा देवें । इस एक बीज से अच्छे खेत में अच्छे प्रबन्ध के द्वारा कम से कम सहस्र कूष्माण्ड (पेठे) उत्पन्न होंगे । यदि प्रत्येक पेठे में एक-एक सौ ही बीज हों तो भी १०००×१००-१००००० बीज होंगे। अब इतने बीजों को पुनः अच्छे खेतों में लगावें । इसी प्रकार लगातार दश वर्ष तक बीज लगाते जावें । आप अनुमान करें वे बीज लता रूप में आके कितनी जमीन घेर लेंगे ।

यदि इसी प्रकार (१००) वर्ष तक बीज बोए जाएँ तो मैं कह सकता हूँ कि पृथिवी पर कहीं जगह नहीं रहेगी । कहिये कैसी अद्भुत लीला है। एक बीज में कितनी शक्ति भरी हुई है। बीज बहुत ही छोटा होता है इससे कितनी शाखा वाली लता बन जाती है। यदि वह लता तौली जाए तो कितने मन होंगे, यह वृद्धि कहाँ से आई -बीज से । जिस समय अंकुर होता है तो देखने से प्रतीत होता है कि उसका स्थूल भाग ज्यों का त्यों ही बना हुआ है। किसी अदृश्य शक्ति से अंकुर निकल आता है और धीरे-धीरे दो-तीन मास में ही एक महान् लताकुंज बन जाता है । पुन: इन्हीं पृथिवी, अप्, तेज, वायु की सहायता से पेठे का बीज, अपने समान ही परिणाम पैदा करता है और मिरची का बीज अपने समान, अंगूर का बीज मधुरता, नीम का बीज तिक्तता, इत्यादि आश्चर्य परिणाम को ये सारे बीज दिखला रहे हैं। इन बीजों में ऐसा अद्भुत प्रबंध किसने कर रखा है, निश्चय वह महान् ईश्वर है । जो प्रकृति और जीव के द्वारा इस महान् प्रबंध को दिखला रहा है । संक्षेपतः यह जानें कि प्रकृति से ही पृथिवी, अपू, तेज और वायु बने हुए हैं। ये दृश्यमान सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, ताराएँ और ये अनंत ब्रह्मांड प्रकृति के ही विकार हैं ।

सृष्टि-विज्ञान :पण्डित शिवशङ्कर शर्मा काव्य तीर्थ

आश्चर्य रूप से सृष्टि का वर्णन वेदों में उपलब्ध होता है । वेदों में कथा-कहानी नहीं है । अन्यान्य ग्रन्थों के समान वेद ऊटपटांग नहीं बकते । मन्त्रद्रष्टा ऋषि प्रथम इस अति गहन विषय में विविध प्रश्न करते हैं । वेदार्थ – जिज्ञासुओं को और वेदों के प्रेमियों को प्रथम वे प्रश्न जानने चाहिए जो अतिरोचक हैं और उनसे ऋषियों के आंतरिक भाव का पूरा पता लगता । वे मन्त्र हम लोगों को महती जिज्ञासा की ओर ले जाते हैं, जिज्ञासा ही ने मनुष्य जाति को इस दशा तक पहुँचाया है, जिस देश में खोज नहीं वह मृत है । कभी अपनी उन्नति नहीं कर सकता । मन्त्र द्वारा ऋषिगण क्या-क्या विलक्षण प्रश्न करते हैं। प्रथम उनको ध्यानपूर्वक विचारिये ।

किं स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत् स्वित् कथासीत् । यतो भूमिं जनयन् विश्वकर्म्मा विद्यामौर्णोत् महिना विश्वचक्षा ॥

– ऋ०१०।८१ । ३

लोक में देखते हैं कि जब कोई कुम्भकार तन्तुवाय वा तक्षा घट, पट, पीढ़ी आदि बनाना चाहता है तब वह पहले सामग्री लेता है और कहीं एक स्थान में बैठ कर घड़ा आदि पात्र बनाता है। अब जैसे लोक में व्यवहार देखते हैं वैसे ही ईश्वर के भी होने चाहिए । अतः प्रथम विश्वकर्मा ऋषि प्रश्न करते हैं कि (स्वित्) वितर्क मैं वितर्क करता हूँ कि ( अधिष्ठानम्) अधिष्ठान अर्थात् बैठने का स्थान (किम्+आसीत्) उस परमात्मा का कौन सा था ? (आरंभणम् + कतमत्) जिस सामग्री से जगत् बनाया है वह आरम्भ करने की सामग्री कौन सी थी ? (स्वित्) पुन: मैं वितर्क करता हूँ (कथा + आसीत् ) बनाने की क्रिया कैसी थी ( यतः ) जिस काल में (विश्वचक्षाः ) सर्वद्रष्टा (विश्वकर्मा) सर्वकर्त्ता परमात्मा (भूमिम् + जनयन्) भूमि को ( द्याम्) और द्युलोक को उत्पन्न करता हुआ (महिना) अपने महत्व से (वि + और्णोत्) सम्पूर्ण जगत को आच्छादित करता है । उस समय इसके समीप कौन सी सामग्री और अधिष्ठान था ? यह एक प्रश्न है । विश्वचक्षा:- विश्व – सब, चक्षा = देखनेहारा । विश्वकर्मा = सर्वकर्ता । पुनः वही ऋषि प्रश्न करते हैं-

किं स्विद् वनं क उ स वृक्ष आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः । मनीषिणो मनसा पृच्छतेदु तद्य दध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन् ॥

ऋ० १०।८१ /४

लोक में देखते हैं कि वन में से वृक्ष काट अनेक प्रकार के भवन बना लेते हैं । ईश्वर के निकट कौन सा वन है ? (स्वित्) मैं वितर्क करता हूँ, (किम्+ वनम् ) कौन सा वन था ? (क: + उ + सः + वृक्ष + आस ) कौन सा वह वृक्ष था ? ( यतः ) जिस वन और वृक्ष से ( द्यावापृथिवी ) द्युलोक और पृथिवी को (निष्टतक्षुः ) काटकर बहुत शोभित बनाता है । ( मनीषिणः) हे मनीषी कविगण ! ( मनसा) मन से अच्छी प्रकार विचार ( तत् + इत् + उ ) उसको भी आप सब पूछें कि (भुवनानि + धारयन्) सम्पूर्ण जगत को पकड़े हुए वह (यद् + अधि + अतिष्ठत्) जिसके ऊपर स्थित है। इस ऋचा के द्वारा ऋषि दो प्रश्न करते हैं, एक जगत् बनाने की सामग्री कौन सी है और दूसरा सबको बनाकर एवं पकड़े हुए वह कैसे खड़ा है ।

विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वत- स्पात्। सं बाहुभ्यां धमति संपतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन्देवएकः ॥

ऋ० १०1८१ । ३

अब स्वयं वेद भगवान् उत्तर देते हैं कि वह परमात्मा (विश्व- तश्चक्षुः ) सर्वत्र जिसका नेत्र है जो सब देख रहा है, (विश्वतोबाहुः ) सर्वत्र जिसका बाहु है ( उत) और ( विश्वतस्पात्) सर्वत्र जिसका पैर है जो (एक: + देव:) एक महान् देव है, वह प्रथम ( बाहुभ्याम्) बाहु से ( संधमति) सब पदार्थ में गति देता है । तब ( पतत्रैः ) पतनशील व्यापक परमाणुओं से ( द्यावाभूमि) द्युलोक और भूमि को (संजनयन्) उत्पन्न करता हुआ ।

एक देव निराधार विद्यमान है । द्वितीय प्रश्न का उत्तर तो यह है कि जब परमात्मा सर्वव्यापक है तब इसके आधार का विचार ही क्या हो सकता है जो एक देशीय होता है वह आधार की अपेक्षा करता है । इस दृश्यमान संसार में वह ऊपर, नीचे, चारों तरफ और अभ्यंतर जब पूर्ण है । तब यह प्रश्न कैसा ? अब प्रथम प्रश्न का उत्तर यह दिया जाता है कि पतत्र = अर्थात् पतनशील-अतिचंचल गतिमान पदार्थ सदा रहता ही है, न वह कभी उत्पन्न हुआ, न होता, न होगा, वह शाश्वत पदार्थ है । उन्हीं पत्र में गति देकर अपनी निरीक्षण यह सारी सृष्टि रचा करता है । इस मन्त्र से सिद्ध है कि परमात्मा इस जगत् का निमित्त कारण है । जीवात्मा और प्रकृति भी नित्य अज वस्तु है । इन्हीं दोनों की सहायता से वह ब्रह्म सृष्टि रचा करता है ।

वेद में विमान की चर्चा :पण्डित शिवशङ्कर शर्मा काव्य तीर्थ

विमान एष दिवो मध्य आस्त आपप्रिवान् रोदसी अन्तरिक्षम् । स विश्वाची रभि चष्टे घृताची रन्तरो पूर्वमपरंच केतुम् ।

+

– यजु० १७/५९

(दिवः + मध्ये) आकाश के मध्य में (एष: + विमानः आस्ते ) यह विमान के समान विद्यमान है। (रोदसी अन्तरिक्षम् ) द्युलोक, पृथिवी तथा अन्तरिक्ष, मानो, तीनों लोकों में ( आपप्रिवान् ) अच्छी प्रकार परिपूर्ण होता है अर्थात् तीनों लोकों में इसकी अहत गति है । (विश्वाची 🙂 सम्पूर्ण विश्व में गमन करनेहारा (घृताची: ) घृत:- जल अर्थात् मेघ के ऊपर भी चलने हारा (सः) वह विमानाधिष्ठित पुरुष ( पूर्वम्) इस लोक (अपरम्+च) उस परलोक ( अन्तरा ) इन दोनों के मध्य में विद्यमान (केतुम् ) प्रकाश (अभिचष्टे ) सब तरह से देखता है ।

यहाँ मन्त्र में विमान शब्द विस्पष्ट रूप से प्रयुक्त हुआ है। इसकी गति का भी वर्णन है तथा इस पर चढ़ने हारे की दशा का भी निरूपण है, अत: प्रतीत होता है कि ऋषिगण अपने समय में विमान विद्या भी अच्छी प्रकार जानते थे । एक अति प्राचीन गाथा भी चली आती है कि प्रथम कुबेर का एक विमान था, रावण उसे ले आया था। रामचन्द्र विजय करके जब लङ्का से चले थे तब उसी विमान पर चढ़ कर लङ्का से अयोध्या आये थे ।

वेद और ग्रहण:पण्डित शिवशङ्कर शर्मा काव्य तीर्थ

चन्द्रमा का घटना – बढ़ना

सूर्य की किरण चन्द्रमा पर सर्वदा पड़ती रहती है। पृथिवी घूमती है अतः पृथिवीस्थ पुरुष चन्द्रमा को सदा प्रकाशित नहीं देखता, क्योंकि पृथिवी की छाया चन्द्र में पड़ जाने से हम लोगों को प्रकाश प्रतीत नहीं होता ।

वेद और ग्रहण

वेदों में कुछ संदिग्ध सा वर्णन आया है जिससे राहु-केतु की कथा चली है और इसको न समझ कर राहुकृत ग्रहण लोग मानने लगे, मैं उन मन्त्रों को यहाँ उद्धृत करता हूँ ।

यत्वा सूर्य स्वर्भानुस्तमसा विध्यदासुरः । अक्षेत्रविद् यथा मुग्धो भुवनान्यदीधयुः ॥

– ऋ०५/४० 1५

(सूर्य) हे सूर्य ! (यद्) जब (त्वा) तुमको (आसुरः ) असुरपुत्र ( स्वर्भानुः ) स्वर्भानु (तमसा ) अन्धकार से (अविध्यत् ) विद्ध अर्थात् आच्छादित कर लेता है तो उस समय (भुवनानि) सम्पूर्ण भुवन पागल से (अदीधयुः) दीख पड़ने लगते (यथा) जैसे (अक्षेत्रवित्) मार्ग को न जानने हारा पथिक (मुग्धः ) मुग्ध अर्थात् घबरा जाता है तद्वत् सम्पूर्ण जगत घबरा जाता है ।

यं वै सूर्यं स्वर्भानुस्तमसा विध्यदासुरः । अत्रय स्तमन्वविन्दन्नह्यन्ये अशक्नुवन् ॥

ऋ०५/४०/९

(आसुरः + स्वर्भानुः ) आसुर स्वर्भानु (यम्+ वै+सूर्यम्) जिस सूर्य को (तमसा + अविध्यत् ) अन्धकार से घेर लेता है (अत्रय: ) अत्रिगण (तम्+अनु+अविन्दन् ) उसको पालते हैं । तम को नष्ट कर अत्रि सूर्य की रक्षा कर प्राप्त करते हैं यहाँ अन्यान्य ऋचाओं में भी इस प्रकार का वर्णन आया है, ब्राह्मण ग्रन्थों में भी इसकी बहुधा चर्चा आती है । केवल एक उदाहरण शतपथ ब्राह्मण से देकर इसका तात्पर्य लिखूँगा-

स्वर्भानुर्ह वा आसुरः सूर्यं तमसा विव्याध स तमसा विद्धो न व्यरोचत तस्य सोमारुद्रावेवैतत्तमोऽपाहतां स एषोऽपहतपाप्मा तपति । -शत० ५। १ । २।१।

तात्पर्य – असुर शब्द

ऋग्वेद में असुर शब्द दुष्ट अर्थ में बहुत ही विरल प्रयुक्त हुआ है । सूर्य, मेघ, वायु, वीर, परमात्मा आदि अनेक अर्थों में यह असुर शब्द विद्यमान है।

वि सुपर्णो अन्तरिक्षाण्यरव्यद् गभीरवेपा असुरः सुनीथः । क्वेदानीं सूर्यः कश्चिकेत कतमां द्यां रश्मि रस्याततान ॥

ऋ० १ । ३५ ।७

यहाँ पर सूर्य के विशेषण में असुर शब्द आया है । जिस कारण सूर्य के प्रकाश से चन्द्र प्रकाशित होता रहता है, अतः (असुरस्य सूर्यस्य अयमासुरः ) असुर जो सूर्य उसका सम्बन्धी होने से चन्द्र आसुर कहाता है ।

स्वर्भानु – स्व-स्वर्ग आकाश, अन्तरिक्ष । भानु-प्रकाश । स्वर्ग का प्रकाश करने हारा चन्द्र है, अतः इसको स्वर्भानु कहते हैं ।

अत्रि – सूर्य किरणों का नाम अत्रि है । ” अदन्ति जलानि ये तेऽत्रयः किरणा:

अब वैदिकार्थ पर ध्यान दीजिए । वेद में कहा गया है कि “आसुर स्वर्भानु सूर्य को अन्धकार से ढाँक लेता है।” ठीक है। आसुर स्वर्भानु जो चन्द्र वह अपनी छायारूप अन्धकार से सूर्य को ढाँक लेता है तब पुनः अत्रि अर्थात् सूर्य किरण ही इसको हटाकर सूर्य की, मानो, रक्षा करता है । शतपथ ब्राह्मण कहता है कि सोम और रुद्र इस तम को विनष्ट करता है । यह भी ठीक है, क्योंकि चन्द्र ही अपनी छाया सूर्य पर डालता है और कुछ देर के पश्चात् वहाँ से दूर हट जाता है । रुद्रनाम विद्युत् का है अर्थात् प्रकाश पुनः आ जाता है । यही, मानो, सूर्य का तम से छूटना है, वेद की यह एक बहुत साधारण बात थी । इसे न समझ कैसी-कैसी कल्पनानाएँ होती गईं।

आधुनिक संस्कृत में ” तमस्तु राहुः स्वर्भानुः सैंहिकेयो विधुन्तुदः ” अमर । स्वर्भानु राहु को कहते हैं कि असुर एक भिन्न जाति मानी जाती है, अतः इस प्रकार का महाभ्रम उत्पन्न हुआ है । मैं बारम्बार कह चुका हूँ कि वेदों की एक छोटी सी बात लेकर बड़ी-बड़ी गाथाएँ बनाते गये। इसलिए उचित है कि लोग वेदों को पढ़ें- पढ़ावें अन्यथा वे कुसंस्कारों से कदापि न छूट सकेंगे ।

ग्रहण क्या है ?

चन्द्र ग्रहण में सम्पूर्ण चन्द्रमण्डल दीख पड़ता है किन्तु मण्डल के ऊपर काली और लाल छाया रहती है । कभी सम्पूर्ण मण्डल के ऊपर और कभी उसके कुछ भाग के ऊपर वह छाया रहती है । सूर्यग्रहण इससे विलक्षण होता है । सूर्यमण्डल अधिक वा स्वल्प भाग उस समय छिपा हुआ रहता

है ग्रहण दो प्रकार के होते हैं । १ – जिनमें सूर्य और चन्द्र के मण्डल का कुछ भाग ही छाया आच्छादित होता है, वह भाग ग्रास वा असम्पूर्ण ग्रास कहाता है। लोग उसको उतना ही अनुभव करते हैं। जितना मेघ से वे दोनों सूर्य और चन्द्र छिप जाएँ । २ – सम्पूर्ण ग्रास में सम्पूर्ण सूर्य और आच्छादित हो जाता है । सूर्य के सम्पूर्ण ग्रास के समय पृथिवी के ऊपर आश्चर्यजनक लीला होती है । पृथिवी के ऊपर उस समय एक विचित्र अन्धकार हो जाता है। न तो रात्रि के समान ही वह अन्धकार है और न ऊषाकाल के समान प्रकाश एवं अन्धकार युक्त ही है । आकाश में ताराएँ दीख पड़ने लगती हैं । पक्षिगण अपने घोसले की ओर दौड़ते हैं। रात्रिञ्चर पशु-पक्षी रात्रि समझ कर बाहर निकलने लगते हैं । अज्ञानी जन डर जाते हैं। बहुत दिनों की बात है कि दो देशों के मध्य घोर संग्राम हो रहा था, उसी समय सूर्यग्रहण लगा। दोनों दलों के सिपाही इतने डर गये कि युद्ध बन्द कर दिया गया और दोनों दलों में सन्धि हो गई। सूर्य के समग्र ग्रास से आजकल भी अज्ञानी जनों में अधिक भय उत्पन्न होता है । वे समझते हैं कि इससे किसी महान् राजा की मृत्यु होगी। महा दुर्भिक्ष, अनावृष्टि, अतिवृष्टि, महामारी, भयंकर युद्ध, भूकम्प आदि उपद्रव इस वर्ष होंगे, किन्तु ये सब मिथ्या बातें हैं । ग्रहण से मृत्यु और दुर्भिक्षादि का कोई भी सम्बन्ध नहीं है ।

नाना कल्पनाएँ

जिन देशों में ग्रहण के तत्व नहीं जानते थे वहाँ इसके सम्बन्ध में विविध कल्पनाएँ लोग किया करते थे १ – प्राचीन काल के रोम निवासी चन्द्रमा को एक देवी समझते थे । जब चन्द्र ग्रहण होता था तब वे मानते थे कि इस समय चन्द्र देवी अपने बच्चे के साथ परिश्रम कर रही है । इसकी सहायता के लिए वे चन्द्र देवी के नाम पर बलि दिया करते थे, उनमें से कोई मानते थे कि कोई जादूगर चन्द्र देवी को क्लेश पहुँचा रहा है । इस हेतु यह काली हो गई है इत्यादि ।

२ – अमेरिका के कुछ मनुष्य मानते थे कि जब-जब चन्द्रमा बीमार हो जाता है तब-तब ग्रहण लगता है । उनको इससे अधिक भय होता था कि ऐसा न हो कि वह हम लोगों के ऊपर गिर कर नष्ट कर दे । इस आपत्ति से बचने के लिए और चन्द्रमा को जगाने के लिए बड़े-बड़े ढोल पीटा करते थे । कुत्तों को मार-मार कर भौंकाते थे, स्वयं अपने बड़े जोर से चिल्लाया करते थे । उसके नैरोग्य के लिए देवताओं से प्रार्थनाएँ करते थे ।

३ – अमेरिका के मैक्सिको देश निवासी समझते थे कि चन्द्रमा और सूर्य में कभी-कभी तुमुल संग्राम हो जाता है । चन्द्रमा हार जाता है उसको बड़ी चोट लग जाती है, इसीलिये इसकी ऐसी दशा होती है । वहाँ के लोग ग्रहण के समय उपवास किया करते थे । स्त्रियाँ डर कर अपनी देह को ही पीटने लगती थीं । कुमारिकाएँ अपनी बाहु में से रक्त निकालने लगती थीं। छोटे-छोटे बच्चे रोने लगते थे ।

अफ्रीका देश अभी तक महान्धकार में है। यहाँ के लोग निग्रो ( हबसी ) कहलाते हैं। वे जंगली अतिमूर्ख पशुवत् हैं। बहुत सी जातियाँ अभी तक कपड़ा पहनना भी नहीं जानती हैं । वहाँ कोई एक यांत्रिक चन्द्र ग्रहण के समय उपस्थित था, वह इसका प्रभाव इस प्रकार वर्णन करता है । एक दिन सन्ध्या समय शीतल वायु चल रही थी । लोग बड़े आनन्द से इधर-उधर मैदान में हवा खा रहे थे । चन्द्रमा के पूर्ण एवं स्वच्छ प्रकाश से और भी लोग बहुत प्रमुदित हो रहे थे ।

इतने में ही चन्द्र कुछ-कुछ काला होना शुरू हुआ। धीरे-धीरे सर्वग्रास हो गया । ज्यों-ज्यों चन्द्र काला पड़ता जाता था त्यों-त्यों आनन्द घटता जाता था, भय और घबराहट बढ़ती जाती थी । सर्वग्रास के समय लोग बहुत घबरा कर इतस्ततः दौड़ने लगे । सैकड़ों पुरुष वहाँ के राजा के निकट दौड़ गये और कहने लगे कि यह आकाश में क्या हो रहा है। इस समय मेघ भी नहीं जिससे चन्द्रमा छिप जाए। वे एक-दूसरे के मुख अचम्भा से देखने लगे कि इस समय क्या आफत हम लोगों के ऊपर आवेंगी। वे ग्रहण के तत्त्व नहीं जानते थे, इसलिये इस प्रकार आकुल-व्याकुल हो रहे थे। बहुत आदमी बहुत जोर से चिल्लाने लगे। कोई डंकाओं को पीटने लगे, कोई तुरही फूंकने लगे। वे मानते थे कि कोई महान् साँप आ के चन्द्रमा को पकड़ लेता है, इसलिये यहाँ से इस असुर को डरा देना चाहिए ताकि वह चन्द्र को छोड़ कर भाग जाए। इसी अभिप्राय से वे डंका बजाना, सब कोई मिलकर हल्ला मचाना, तुरही फूंकना आदि काम जरूरी समझते थे । जब धीरे-धीरे पुनः चन्द्रमा स्वच्छ होने लगा तब वे निग्रो ( हबसी ) बड़ी खुशी मना-मना कर अपने पुरुषार्थ की प्रशंसा करने लगे ।

५ – शोक की बात है कि जिनके पूर्वज अच्छी प्रकार ग्रहण तत्त्व जानते थे वे भी भारतवासी इन्हीं जंगलियों के समान ग्रहण मानने लगे। आश्चर्य यह है कि यहाँ एक ओर ज्योतिषशास्त्र चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है कि पृथिवी की छाया से चन्द्र ग्रहण और चन्द्र की छाया से सूर्य ग्रहण होता है । न कोई असुर, न कोई साँप और न कोई अन्य पदार्थ ही चन्द्र-सूर्य को क्लेश पहुँचा सकता है । चन्द्र-सूर्य एक जड़ पदार्थ है । प्रतिदिन छायाकृत ग्रहण रहता ही है इसी कारण चन्द्रमा बढ़ता और घटता है । मेघ के आने से जैसे चन्द्रमा और सूर्य छिपा सा प्रतीत होता है । वैसा ही ग्रहण भी समझो। ग्रहण के कारण कदापि भी महामारी आदि उपद्रव नहीं होते इत्यादि विस्पष्ट और सत्य बात ज्योतिष शास्त्र बतला रहा है । वह शास्त्र पढ़ाया भी जा रहा हैं किन्तु दूसरी ओर मूर्खता की ऐसी धारा चल रही है कि जिसका वर्णन महाकवि भी नहीं कर सकते । ग्रहण के समय हजारों-लाखों आदमी काशी, प्रयाग और कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों की ओर दौड़ते हैं। राहु नाम के असुर से चन्द्र सूर्य को बचाने हेतु कोई जप, कोई दान, कोई पूजा करता। इस समय

नाना कल्पनाएँ

को अशुभ समझ कोई स्नान करता, कोई समझता है कि यदि ग्रहण के समय काशी, गंगा वा कुरुक्षेत्र में स्नान हो गया तो मुक्ति साक्षात् हाथ में ही रखी हुई है । डोम और भंगी जोर-जोर से चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं कि ग्रहण लग गया, दान पुण्य करो इत्यादि विचित्र लीला आज भी भारत में देखते हैं। पुराणों ने यहाँ की सारी विद्याएँ नष्ट-भ्रष्ट कर दीं। वे कैसी मूर्खता की कथा गढ़ते हैं – एक समय देव और असुर मिल के समुद्र मंथन कर अमृत ले आए। असुरगण अमृत को ले भागने लगे । देवगण वहाँ ही मुँह देखते रह गये । तब विष्णु भगवान् मोहिनी स्त्री रूप धर असुरों के निकट जा उन्हें मोहित कर उनसे अमृत के घड़े को अपने हाथ में लेके दोनों दलों को बराबर बाँट देने की सन्धि कर उन्हें बिठला मन में छल रख अमृत बाँटने लगे । प्रथम देव लोगों को अमृत देना आरम्भ किया । असुरों में एक राहु विष्णु के कपट – व्यवहार से परिचित था, अतः वह सूर्य और चन्द्र के बीच में आके बैठ गया था । ज्योंही विष्णु उस राहु को अमृत देने लगे त्योंही सूर्य और चन्द्र ने इशारा किया किन्तु कुछ अमृत इसके हाथ पर गिर चुका था और उसको उसने पी भी लिया । विष्णु ने उसे असुर जान चक्र से इसका शिर काट लिया। वह राहु और केतु दो हो गया । तब से ही वे दोनों अपने बैरी सूर्य-चन्द्र को समय-समय पर पीड़ा दिया करते हैं, इसीलिये ग्रहण होता है । यह पौराणिक गप्प है ।

६ – बौद्ध सम्प्रदायी भी पौराणिक ही एक प्रकार से हैं, अतः वे भी राहुकृत ही ग्रहण मानते हैं । इनमें चन्द्रप्रीति और सूर्यप्रीति नाम के दो स्तोत्र ग्रहण के समय में पड़ते हैं । चन्द्रप्रीति में इस प्रकार वर्णन आता है कि एक समय किसी एक स्थान में बुद्धदेव जी समाधिस्थ थे। उसी समय राहु नाम का असुर चन्द्रमा को अपने पेट में निगलने लगा । चन्द्र बहुत ही दुःखित हुए । बुद्ध को समाधि में देख जोर से पुकार चन्द्र भगवान् कहने लगे कि मैं आपकी शरण में हूँ । आप सबकी रक्षा करते हैं मेरी भी आप रक्षा कीजिए। इस कातर शब्द को सुन दयालु बुद्ध जी ने राहु से कहा कि तू यहाँ से चन्द्र को छोड़ भाग जा, क्योंकि चन्द्र ने मेरी शरण ली है । बुद्ध की इतनी बातें सुन चन्द्र को छोड़ डरता – काँपता साँस लेता हुआ वह राहु असुराधिपति विप्रचिति के निकट भाग कर जा पहुँचा और कहने लगा कि यदि मैं चन्द्रमा को न छोड़ता तो न जाने मेरी क्या दशा होती । बुद्ध ने मेरा अत्याचार देख लिया । सूर्यप्रीति में भी इसी प्रकार की गप्प है।

७- चीन देश निवासी भी निग्रो ( हबसी ) हिन्दू और बौद्ध के समान ही समझते थे कि कोई लाल और कृष्ण साँप ही चन्द्र एवं सूर्य को तंग किया करता है । वे हिन्दू के समान न तो स्नान करते और न बौद्ध के समान चन्द्रप्रीति आदि स्तोत्र ही पढ़ते, किन्तु अफ्रीका के हबसी के समान सब कोई मिलकर बड़े जोर से चिल्लाने, ढोल बजाने, डंका पीटने लगते हैं ताकि इस शोर से डर कर वह सर्प भाग जाए । इत्यादि भिन्न देशवासी, अपनी-अपनी कल्पनाएँ किया करते हैं।

ये सर्व कल्पनाएँ मिथ्या हैं, क्योंकि यद्यपि चन्द्रमा और सूर्य यहाँ से देखने में अतिलघु प्रतीत होता है, किन्तु चन्द्रमा भी एक पृथिवी के समान ही लोक है वहाँ भी जीव निवास करते हैं । पृथिवी से थोड़ा ही छोटा चन्द्र है। सूर्य की कथा ही क्या । १३००००० तेरह लक्ष गुणा सूर्य पृथिवी से बड़ा है । वह अग्नि का महासमुद्र है । इस सूर्य के चारों तरफ लाख कोश में कोई शरीरधारी जीव इसकी ज्वाला से नहीं बच सकता है । यह सम्पूर्ण पृथिवी भी पर्वतसमुद्रादि सहित यदि सूर्यमंडल में डाल दी जाए तो एक क्षण में जलकर भाप हो जाए। जब ऐसी विस्तृत पृथिवी की वहाँ पर यह दशा हो तो आप विचार सकते हैं कि सर्प और असुर वहाँ कैसे पहुँच सकते। अतः राहु आदि की कथा सर्वथा मिथ्या है, पुनः जब राहुकृत ग्रहण होता तो नियमपूर्वक पूर्णिमा और अमावस्या तिथि को ही चन्द्र-सूर्य ग्रहण किस प्रकार होता । वह चेतन राहु स्वतन्त्र है जब चाहता तब ही सूर्य चन्द्र को धर पकड़ता किन्तु ऐसा नहीं होता, अतः यह कल्पना मिथ्या है । पुनः विद्वान् गण सैकड़ों वर्ष पहले ही ग्रहणों के मास, तिथि, पल, क्षण बतला सकते हैं। इतना ही नहीं, वे किस क्षण में ग्रहण और किस क्षण में मोक्ष होना आरम्भ होगा, यह भी कह सकते हैं । तब आप विचार करें कि यदि कोई सर्प वा राहु का यह कार्य होता तो गणित के द्वारा पण्डितगण इस विषय को कैसे कह सकते थे । इस हेतु उपयुक्त समस्त कल्पनाएँ मिथ्या होने से त्याज्य हैं ।

पृथिवी की छाया चन्द्रमा के ऊपर पड़ती है, अतः चन्द्र ग्रहण होता है । इसी हेतु चन्द्र ग्रहण ईषदुक्त सा प्रतीत होता है । चन्द्र की छाया से सूर्य ग्रहण होता है । चन्द्रमा सर्वथा काला है । अत: सूर्य ग्रहण काला प्रतीत होता है । इसी कारण लाल और कृष्ण सर्प की भी कथा चल पड़ी है ।

वर्ष में २ से कम और ७ से अधिक ग्रहण नहीं हो सकता । साधारणतया वर्ष में ४ चार ग्रहण होते हैं । इति ।

चन्द्रमा :पण्डित शिवशङ्कर शर्मा काव्य तीर्थ

अब आकर्षण आदि विषय अधिक वर्णित हो चुके, मेरे अन्यान्य ग्रन्थ देखिये | अब कुछ चन्द्र के सम्बन्ध में वक्तव्य है । इस सम्बन्ध में भी धर्मग्रन्थ बहुत ही मिथ्या बात बतलाते हैं । १ – यह चन्द्र अमृतमय है । उस अमृत को देवता और पितृगण पी लेते हैं, इसी कारण यह घटता-बढ़ता रहता है। पुराणों का गप्प तो यह है ही, परन्तु महाकवि कालिदास भी इसी असम्भव का वर्णन करते हैं-

पर्य्यायपीतस्य सुरैर्हिमांशोः कलाक्षयः श्लाध्यतरोहि वृद्धेः ।

२ – कोई कहते हैं कि इस चन्द्रमा की गोद में एक हिरण बैठा है । इसी से इसमें लांछन दीखता है और इसी कारण इसको मृगाङ्क, शशी आदि नामों से पुकारते हैं । ३ – यह अत्रि ऋषि के नयन से उत्पन्न हुआ है । कोई कहते हैं कि यह समुद्र से उत्पन्न हुआ। ४– -पुराण कहते हैं कि दक्ष की अश्विनी, भरणी आदि सत्ताईस कन्याओं से चन्द्रमा का विवाह है, वे ही २७ नक्षत्र हैं । ५ – यह सूर्य से भी ऊपर स्थित है । ६ – इसी से चन्द्र वंश की उत्पत्ति है । ७ – राहु इसको ग्रसता है, अत: चन्द्र ग्रहण होता है इत्यादि अनेक गप्प चन्द्र के विषय में कहे जाते हैं । यहाँ मैं संक्षेप से वेद के मन्त्र उद्धृत कर बतलाऊँगा कि वेद भगवान् इस विषय को किस दृष्टि से देखते हैं-

चन्द्रमा का प्रकाश

अथाऽप्यस्यैको रश्मिश्चन्द्रमसं प्रति दीप्यते तदेतेनोपेक्षितव्य मादित्यतोऽस्य दीप्तिर्भवति । – निरुक्त २ । ७ ।

यास्काचार्य कहते हैं कि सूर्य की एक किरण चन्द्रमा के ऊपर सदा पड़ती रहती है। इससे यह जानना चाहिए कि चन्द्रमा का प्रकाश सूर्य से होता है । पृथिवी के समान ही चन्द्रमा भी निस्तेज और अन्धकारमय है, जैसे पृथिवी के ऊपर जिस-जिस भाग में सूर्य की किरण पड़ती रहती है वहाँ-वहाँ दिन होता है। इसी प्रकार चन्द्रमा के ऊपर भी सूर्य की किरण पड़ती रहती है, अतः इसमें प्रकाश मालूम होता है। सूर्य की किरण न पड़ती तो चन्द्र सदा धुँधला प्रतीत होता ।

इस अतिगहन विज्ञान का भी वेद में विविध प्रकार से वर्णन है । यास्काचार्य ने वेद का ही आशय लेकर उपर्युक्तार्थ प्रकट किया है और यहाँ ही एक-दो और प्रमाण देकर इसको बहुत पुष्ट किया है ।

अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टु रपीच्यम् । इत्था चन्द्रसो गृहे ॥

ऋ० १।८४/१

(गोः) गमनशील ( चन्द्रमसः ) चन्द्रमा के (अत्र+ह+गृहे) इसी गृह में (त्वष्टः ) सूर्य का (नाम) सुप्रसिद्ध ज्योति ( इत्था ) इस प्रकार ( अपीच्यम् ) अन्तर्हित अर्थात् छिपा हुआ रहता है । यह ऋचा सर्व सन्देह को दूर कर देती है । चन्द्रमा के गृह में सूर्य का प्रकाश छिपा हुआ है । इस वर्णन से तो विस्पष्ट सिद्ध है कि सूर्य के प्रकाश से ही चन्द्र प्रकाशित है । पुनः इसी अर्थ को अन्य प्रकार से वेद भगवान निरूपण करते हैं, वह यह है-

सोमो वधूयुरभव दश्विनास्तामुभा वरा । सूर्य्यां यत्पत्ये शंसन्तीं मनसा सविता ददात् ॥

– ऋ० १० । १८५।९।

सूर्य की कन्या से चन्द्रमा के विवाह का वर्णन यहाँ अलंकार रूप से किया गया है। सूर्य की प्रभा ही मानों सूर्य कन्या है । अथ मन्त्रार्थ- (सोमः ) चन्द्रमा (वधूयुः) वधू की इच्छा वाला हुआ अर्थात् चन्द्रमा ने विवाह करने की इच्छा की। (उभौ + अश्विनौ+ वरौ + आस्ताम् ) इस बराती में अश्वी अर्थात् दिन और रात्रि देव बरात हुए । (यद्) जब (मनसा) मन के परम अनुराग से (पत्ये + शंसन्तीम्+ सूर्याम्) पति के लिए चाह करती हुई सूर्या (अपनी कन्या को ) सूर्य ने देखा तब ( सविता + अददात् ) सूर्य ने चन्द्र के अधीन सूर्या को कर दिया। इस आलंकारिक वर्णन से विशद हो जाता है कि चन्द्रमा का प्रकाश सूर्य से हुआ करता है । यह विषय भारत देश में इतना प्रसिद्ध हो गया था कि घर-घर इसको लोग जानते थे । काव्य नाटकों में भी इसकी चर्चा होने लगी । जो विषय अति प्रसिद्ध हो जाता है उसी का निरूपण कविगण अपने काव्यादि ग्रन्थों में किया करते हैं। कालिदास पौराणिक समय के विद्वान् थे, अतः अपने काव्यों को वैदिक और लौकिक दोनों

सिद्धान्तों से भूषित किया है। जैसे पौराणिक गप्प लेकर कालिदास जी ने कहा है कि देव और पितर चन्द्र का अमृत पीते रहते हैं, अतः चन्द्र की कला घटती-बढ़ती रहती है। वैसे ही वैदिक अर्थ को लेकर कहते हैं कि सूर्य के प्रकाश से चन्द्र प्रकाशित होता है; यथा-

पितुः प्रयत्नात् स समग्रसम्पदः शुभैः शरीरावयवैर्दिनेदिने । पुपोष वृद्धिं सरिदश्वदीधितेरनुप्रवेशादिव बालचन्द्रमा ।

– रघुवंश ३ । २२

सम्पूर्ण धनधान्य युक्त पिता के प्रयत्न से वह रघु दिन-दिन शरीर के शुभ अवयवों से बढ़ने लगे; जैसे- (बालचन्द्रमाः) छोटा चन्द्रमा (हरिदश्वदीधिते 🙂 सूर्य के ( अनुप्रवेशात्) अनुप्रवेश से शुक्ल पक्ष में दिन-दिन बढ़ता जाता है ।